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Showing posts with the label #अंतर्मन_की_बात

वार्तालाप अहम है!

             कल शाम बड़ी देर तक रास्ता देखती रही, तुम कुछ देर से घर आये,पूछने का मन तो हुआ फिर वही रोज-रोज की किच-किच का सोचकर चुप रह गयी। कल मेरी रचना प्रकाशित हुई थी। तुम्हें अख...

शोर होना चाहिए!

जल गया दीपक अपनी ही आग से, क्या ढूँढते हो अब बची इस राख में। विश्व ने माना लोहा जिसका, वो तिरंगा झुका जा रहा अपनी ही आँख में। जीत जाते गर जंग बाहरी होती, हम हारे अपनी आस्तीन के सा...

मां भारती

घात ह्रदय पर बैचेन मन हैं, उदास चित्त और भींगे नयन है। मेरा देश ऐसा नही है, माँ के बिन बच्चा सोता नही है। भटके हुए कुछ नादान हैं मां, दिलों में घृणा की अगन हैं। तुझसे प्रेम बहुत...

सोचती हूँ!

चमक बहुत  है उसमे सोचती हुँ वो चाँद तो नही । मुश्किल है उसे सच कहना सोचती  हूँ वो ख्वाब तो नही। आस-पास लगते हो वाकई तुम साथ तो नही। दर्द से ज्यादा तड़प है तुम कहो ये दर्द अज़ाब ...

अना..

मेरी रज़ा से ...उसकी अना का कद बड़ा था, मै सामने थी उसके, मिरे सामने कोई और खड़ा था।

चुप्पी

जब वास्तों में शोर बढ़ जाए, मुनासिब है  कि हम खामोश हो जाए । ।

जहान....

शौक- ऐ-मोहब्बत पाल कर देख ली हमने, अब हकीकत- ऐ-जहां आज़मा कर देखते हैं। कुछ तुम छुपा कर देख लो, कुछ हम बता कर देखते हैं।।

कभी....

मेरे आने की बात सुन कर, उनका जाना मुनासिब था। कभी मैं उसको हासिल थी, कभी वो मुझको हासिल था।। #अंतर्मन

लिबास

लम्स, अज़ाब, अक्स और ख्वाब..... इनसे मिलकर जो बने वो लिबास हो तुम!!

ख्याल

ख्याल अच्छा था दिल को बहलाने के लिए, लोग जाते हैं अक्सर लौट आने के लिए। अबके जब उनसे मुलाकात हुई सरे-राह तो जाना, लोग रास्ते बदल लेते हैं मुंह छुपाने के लिए।। #अंतर्मन

माँ

हाथ पकड़ चलता था जो कभी, वो बेटा वृद्ध आश्रम में माँ को बिठा गया। दे कर दिलासा लौट कर आने का, वो अपना पल्ला झड़ा गया। वो जानती है अब ना लौटेगा वो कभी, उसका लाल उससे पीछा छुड़ा गया...

रवाज़-ऐ-मुहब्बत

हर शाम तेरे दर तक आती हूँ,  लौट जाती हूँ, मानो बेसबब ही कोई रवाज़,  बेवजह ही निभाती हूँ।

हसरतें

सिसकती रह गयी आँखें, हसरते चुपचाप दम तोड़ गई। जाना हमें भी था मंजिल तलक़, फिर मंजिल ही राह में छोड़ गई।।

दस्तूर....

अजब दस्तूर-ऐ-मोहब्बत निभाने को कहते हो दिल-ऐ-दाग़ दार से मुस्कराने को कहते हो। खुद आते हो याद हद की हद तक और मुझसे भूल जाने को कहते हो।।

मजबूर हूँ!

मैं चल भी ना पाई तुम संग थोडे़ से फासलों ने देखो कितना थका दिया, कोशिशों में थी किसी तरह फिर खडे़ होने की मेरी कोशिशों ने ही मुझे फिर गिरा दिया। पैर लड-खड़ा गए छालों के दर्द से ...

दास्तान

दास्तां     मैं सोच में डूबी थी    वो मुझमे तैर गया,    वो करीब रहा मेरे    बस, फिर भी गैर रहा।               बेहाल रही कब तक                तुम मेरे हाल पे झेपो ना,                मेरा वक्त खराब था                मिरा मीत नहीं था बुरा।    मैं उस पार खड़ी रही    वो इस पार रहा खड़ा,    दोष किनारों का  नहीं    बस, लहरों का बहाव तेज था।                 इक पल की बात नहीं                 सारे जीवन कि  है  दासतां,                 तुम मिले और रह गए मुझमे                 ढूँढने को तुम्हें, मैं क्यों जाऊँ यहाँ-वहाँ।