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अना..

मेरी रज़ा से ...उसकी अना का कद बड़ा था, मै सामने थी उसके, मिरे सामने कोई और खड़ा था।

चुप्पी

जब वास्तों में शोर बढ़ जाए, मुनासिब है  कि हम खामोश हो जाए । ।

जहान....

शौक- ऐ-मोहब्बत पाल कर देख ली हमने, अब हकीकत- ऐ-जहां आज़मा कर देखते हैं। कुछ तुम छुपा कर देख लो, कुछ हम बता कर देखते हैं।।

कभी....

मेरे आने की बात सुन कर, उनका जाना मुनासिब था। कभी मैं उसको हासिल थी, कभी वो मुझको हासिल था।। #अंतर्मन

लिबास

लम्स, अज़ाब, अक्स और ख्वाब..... इनसे मिलकर जो बने वो लिबास हो तुम!!

ख्याल

ख्याल अच्छा था दिल को बहलाने के लिए, लोग जाते हैं अक्सर लौट आने के लिए। अबके जब उनसे मुलाकात हुई सरे-राह तो जाना, लोग रास्ते बदल लेते हैं मुंह छुपाने के लिए।। #अंतर्मन

माँ

हाथ पकड़ चलता था जो कभी, वो बेटा वृद्ध आश्रम में माँ को बिठा गया। दे कर दिलासा लौट कर आने का, वो अपना पल्ला झड़ा गया। वो जानती है अब ना लौटेगा वो कभी, उसका लाल उससे पीछा छुड़ा गया...